लोकल फॉर वोकल को मिल रहा बढ़ावा
कारीगरों की महीनों की मेहनत से तैयार हुए लाखों दिये

छतरपुर। दीपावली पर्व नजदीक आते ही शहर के बाजारों में रौनक लौट आई है। सड़कों और गलियों में मिट्टी के सुंदर-सुंदर दियों से सजी दुकानें ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं। पारंपरिक देशी दियों की बिक्री में इस बार भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। लोकल फॉर वोकल अभियान के तहत लोग देशी उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे छोटे कारीगरों और दुकानदारों को बड़ा सहारा मिल रहा है।
दिये बनाने वाले कारीगर नरेन्द्र प्रजापति निवासी छतरपुर ने बताया कि दीपावली के लिए दीये बनाने की तैयारी वे दो से तीन माह पहले से ही शुरू कर देते हैं। सबसे पहले मिट्टी को छानकर उसे आटे की तरह गूंथा जाता है, फिर उसे सांचे में ढालकर भट्टी में पकाया जाता है। अब तो छोटी मशीनों के आने से यह काम और भी तेज़ी से होने लगा है। उन्होंने बताया कि देशी दियों की मांग हर साल बढ़ रही है और लोग अब विदेशी लाइटिंग की जगह मिट्टी के दियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। नरेन्द्र प्रजापति ने कहा यह हमारा पारिवारिक धंधा है। पहले पिताजी दिया बनाते थे, अब हम बना रहे हैं। हम चाहते हैं लोग देशी दिया जलाएं ताकि छोटे दुकानदारों और कारीगरों का रोजगार चलता रहे। वहीं एक अन्य कारीगर राजकुमार प्रजापति ने बताया कि वह तीन माह पहले से लगातार दिये बनाने में जुट जाते हैं। एक सीजन में लगभग दो से तीन लाख दीये तैयार करते हैं। दीपावली के चार दिन के बाजार में ही पूरे साल की कमाई हो पाती है।
ग्राहकों में भी दिखा उत्साह
त्योहार की रौनक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दियों की दुकानों पर ग्राहक भी पहुंच रहे हैं। ग्राहक रोहित चौरसिया ने बताया मैं हर साल दीपावली पर लोकल बाजार से ही मिट्टी के दिये खरीदता हूं। यह हमारी परंपरा है। हमें विदेशी वस्तुओं से बचना चाहिए और अपने देशी उत्पादों को बढ़ावा देना चाहिए।
लोकल कारीगरों को बड़ा सहारा
दीयों की बढ़ती बिक्री से कारीगरों में भी खुशी का माहौल है। उनका कहना है कि अगर लोग देशी उत्पादों को अपनाएंगे तो उनका रोजगार सुरक्षित रहेगा और परंपरा भी जीवित रहेगी। दीपावली पर मिट्टी के दीये न केवल घर को रौशन करते हैं बल्कि सैकड़ों परिवारों के जीवन में भी उजाला भरते हैं।