रिलायंस की बैटरी योजना पर चीन का ब्रेक, कैसे पूरा होगा मुकेश अंबानी का यह सपना
रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने भारत में लिथियम-आयन बैटरी सेल बनाने की योजना को रोक दिया है, क्योंकि कंपनी को चीनी तकनीक हासिल नहीं हो सकी। द इकनॉमिक टाइम्स के सूत्रों के अनुसार, मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली यह तेल से टेलीकॉम तक फैली कंपनी इस साल सेल उत्पादन शुरू करने की तैयारी कर रही थी। इस खबर के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में सुबह के कारोबार के दौरान 1 फीसद से अधिक की गिरावट है।वह चीनी कंपनी शियामेन हिथियम एनर्जी स्टोरेज टेक्नोलॉजी से सेल तकनीक लाइसेंस लेने की बातचीत में लगी थी, लेकिन बीजिंग के विदेशी तकनीक हस्तांतरण पर रोक के कारण यह सौदा रुक गया। अब रिलायंस बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के असेंबली पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जो उसके रिन्यूबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए कंटेनर होंगे।
चीन की सख्ती से चुनौतियां बढ़ीं
चीन ने क्लीन एनर्जी तकनीक सौदों पर निगरानी बढ़ा दी है, ताकि अपनी रणनीतिक बढ़त बरकरार रख सके। इससे विदेशी कंपनियों को भारत में स्थानीय उत्पादन शुरू करने में दिक्कत हो रही है। रिलायंस की यह परेशानी दर्शाती है कि भारत की कंपनियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2070 तक कार्बन-जीरो लक्ष्य को हासिल करने में चीन के साथ बेहतर संबंधों के बिना प्रगति नहीं कर पा रही हैं।कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि उनकी योजनाओं में कोई बदलाव नहीं हुआ है और BESS, बैटरी पैक तथा सेल उत्पादन हमेशा से उनके प्लान का हिस्सा रहे हैं।
गिगा फैक्ट्री की महत्वाकांक्षा पर असर
अगस्त में मुकेश अंबानी ने शेयरधारकों को बताया था कि बैटरी गिगाफैक्ट्री 2026 में शुरू होगी। सेल उत्पादन रुकने से तत्काल वित्तीय नुकसान नहीं हुआ, क्योंकि कंपनी की कमाई मुख्य रूप से तेल शोधन और उपभोक्ता व्यवसाय से आती है, लेकिन यह अंबानी की ग्रीन एनर्जी महत्वाकांक्षाओं के लिए चुनौती है। 2021 में उन्होंने 10 अरब डॉलर के निवेश से चार गिगा फैक्ट्री की घोषणा की थी, ताकि जीवाश्म ईंधन से हटकर नई दिशा मिले।कंपनी के विशेषज्ञों का मानना है कि बिना चीनी तकनीक के आगे बढ़ना लागत बढ़ाएगा और जोखिम ज्यादा होगा, खासकर जब वैश्विक बाजार में बैटरी की अधिकता है। जापान, यूरोप और दक्षिण कोरिया की तकनीकें महंगी और भारत के बड़े पैमाने पर कम प्रतिस्पर्धी पाई गईं।
पूरे उद्योग पर असर
इंडिया इंक की कई कंपनियां बैटरी स्टोरेज क्षमता बढ़ाने की दौड़ में हैं, लेकिन तकनीकी बाधाओं से जूझ रही हैं। अडानी ग्रुप और जेएसडब्ल्यू ग्रुप जैसी कंपनियां भी सेल उत्पादन के बजाय बैटरी पैक और कंटेनर असेंबली पर जोर दे रही हैं।
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