आरबीआई गवर्नर बोले- प. एशिया संकट का असर, देश में तेल-गैस उत्पादन में इजाफा
प्रिंसटन (अमेरिका)। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय में अपने संबोधन के दौरान वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहा संघर्ष भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह क्षेत्र भारत के व्यापारिक और आर्थिक हितों से गहराई से जुड़ा है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है पश्चिम एशिया?
गवर्नर ने आंकड़ों के जरिए बताया कि भारत की इस क्षेत्र पर निर्भरता कितनी अधिक है:
- निर्यात (Export): भारत के कुल निर्यात का लगभग 1/6 हिस्सा इसी क्षेत्र में जाता है।
- कच्चा तेल (Crude Oil): भारत अपनी तेल जरूरतों का आधा हिस्सा यहीं से आयात करता है।
- रेमिटेंस (Remittance): विदेशों से आने वाले कुल धन का लगभग 2/5 हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।
- उर्वरक: कृषि के लिए जरूरी खादों की आपूर्ति के लिए भी यह क्षेत्र बेहद अहम है।
अर्थव्यवस्था की स्थिति और विकास दर
मल्होत्रा ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का श्रेय पिछले दशक के सुधारों को दिया:
- तुलनात्मक वृद्धि: पिछले 10 वर्षों में भारत की औसत विकास दर 6.1% रही है, जो वैश्विक औसत (3.2%), चीन (5.6%) और इंडोनेशिया (4.2%) से कहीं अधिक है।
- स्थिरता का आधार: मजबूत नीतियां, राजकोषीय अनुशासन और वित्तीय स्थिरता ने भारत की आर्थिक नींव को सुरक्षित बनाया है।
ऊर्जा संकट और महंगाई पर रणनीति
संकट के बीच सरकार और आरबीआई की रणनीति को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया:
- उत्पादन और विकल्प: भारत घरेलू स्तर पर तेल-गैस उत्पादन बढ़ाने और आयात के लिए नए देशों से संपर्क साधने पर काम कर रहा है ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो।
- कीमतों का बोझ: कच्चे तेल की कीमतों का असर जनता पर कम पड़े, इसके लिए सरकार और तेल कंपनियों ने बोझ साझा किया है, हालांकि गैस की कीमतों में आंशिक वृद्धि उपभोक्ताओं तक पहुँची है।
- मौद्रिक नीति: आरबीआई फिलहाल 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) की नीति अपना रहा है। गवर्नर ने कहा कि आपूर्ति में बाधा आने पर तुरंत सख्त कदम उठाने के बजाय स्थिति को समझना जरूरी है, ताकि विकास और महंगाई के बीच संतुलन बना रहे।
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