विजय के बहुमत दावे पर विश्लेषकों की राय, राजनीतिक संकट गहराया
तमिलनाडु में सत्ता का पेच: टीवीके सबसे बड़ी पार्टी, पर बहुमत से दूर; राज्यपाल और विजय के बीच 'नंबर गेम' पर खिंची तलवारें
चेन्नई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति को एक दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। अभिनेता से राजनेता बने विजय की नई पार्टी, 'तमिझगा वेत्री कड़गम' (TVK), सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन वह बहुमत के जादुई आंकड़े से महज 10 सीटें पीछे रह गई है। सरकार बनाने को लेकर जारी इस रस्साकशी के बीच, विजय लगातार राजभवन के चक्कर लगा रहे हैं, जबकि राज्यपाल स्पष्ट बहुमत की सूची की मांग पर अड़े हुए हैं। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर विशेषज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी राय साझा की है।
विशेषज्ञों का विश्लेषण: क्या कहता है संविधान और जमीनी हकीकत?
पीयूष पंत (वरिष्ठ पत्रकार):
संवैधानिक मर्यादा के अनुसार, राज्यपाल को सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना चाहिए, जिसके बाद सदन में बहुमत साबित करने की प्रक्रिया होती है। टीवीके को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है, जिससे समीकरण बदल रहे हैं। मुझे विश्वास है कि अंततः विजय ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।
पूर्णिमा त्रिपाठी (वरिष्ठ पत्रकार):
राज्यपाल के पास बहुमत की जांच करने का अंतिम अधिकार नहीं है, क्योंकि इसका फैसला केवल सदन की कार्यवाही (फ्लोर टेस्ट) के दौरान होता है। हालांकि, तकनीकी रूप से विजय के दावों में कुछ कमियां थीं—उन्होंने 120 विधायकों के समर्थन का दावा किया, लेकिन पत्र में सभी के हस्ताक्षर मौजूद नहीं थे। यह स्पष्ट है कि विजय ने तमिलनाडु में 'गैर-द्रविड़' राजनीति के रिक्त स्थान को भर दिया है।
स्थिरता और चुनौतियों पर सवाल
राकेश शुक्ल:
कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जहाँ राज्यपाल ने बिना बहुमत के भी सरकार बनाने का न्योता दिया और वे दल बाद में विफल रहे। इसलिए, यदि राज्यपाल वर्तमान में संख्या बल की मांग कर रहे हैं, तो वे गलत नहीं हैं। यदि विजय सरकार बना भी लेते हैं, तो उसकी स्थिरता को लेकर संशय बना रहेगा।
अनुराग वर्मा:
फिल्मी पर्दे और वास्तविक राजनीति में मुख्यमंत्री की भूमिका निभाना दो अलग बातें हैं। विजय के लिए असली चुनौती द्रविड़ विचारधारा के मंझे हुए नेताओं को अपने साथ लेकर चलना होगा। वे दक्षिण भारतीय सिनेमाई अंदाज से निकलकर असल शासन व्यवस्था को कैसे संभालते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।
द्रविड़ राजनीति का प्रभाव
संजय राणा:
संविधान राज्यपाल को यह विवेकाधीन अधिकार देता है कि वे किसे आमंत्रित करें। एक नए राजनेता के लिए नंबरों का प्रबंधन करना किसी अनुभवी राजनीतिक दल की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। यही कारण है कि विजय को वर्तमान में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
विनोद अग्निहोत्री:
मैं इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ कि तमिलनाडु द्रविड़ राजनीति से अलग हो गया है। वहां की जड़ें द्रविड़ विचारधारा में बहुत गहरी हैं। हालांकि राज्यपाल को विकल्पों पर विचार करना चाहिए, लेकिन तकनीकी रूप से उनकी वर्तमान प्रक्रिया संवैधानिक दायरे में ही है।
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