जहां कृष्ण ने रखे थे 7 कदम! अब उसी धरोहर को बचाने के लिए जुटा पूरा गांव
सीकर जिले के कदमा का बास गांव के लोगों ने यह साबित कर दिया है कि ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं होती, बल्कि समाज भी अपनी विरासत को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. गांव के लोगों ने करीब 500 वर्ष पुराने श्री राधा-कृष्ण मंदिर के जीर्णोद्धार का जिम्मा अपने हाथों में लिया है. इस कार्य पर लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. मंदिर के साथ-साथ यहां स्थित पौराणिक कुंड के संरक्षण और सौंदर्यीकरण का काम भी जनसहयोग और श्रमदान के माध्यम से किया जा रहा है.
कदमा का बास गांव में मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य इन दिनों तेजी से चल रहा है. इसे पूरा होने में अभी लगभग दो वर्ष का समय लग सकता है. निर्माण कार्य में करौली के उच्च गुणवत्ता वाले पत्थरों का उपयोग किया जा रहा है. प्रत्येक पत्थर पर बारीक नक्काशी की जा रही है, जिसके लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 35 से अधिक कारीगर जुटे हुए हैं. नक्काशी का अधिकांश कार्य करौली में किया जाता है, जबकि मंदिर परिसर में पत्थरों की फिटिंग और अन्य निर्माण कार्य जारी हैं. ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर का स्वरूप पहले से अधिक भव्य और आकर्षक बनाया जा रहा है.
गांव का इतिहास और धार्मिक महत्व
ग्रामीणों के अनुसार कदमा का बास गांव का इतिहास बेहद प्राचीन है. इस गांव का उल्लेख संवत 1030 के हर्ष शिलालेख में ‘कर्दमखता’ नाम से मिलता है. यह स्थान ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ धार्मिक आस्था का भी प्रमुख केंद्र माना जाता है. मान्यता है कि महाभारत काल में इस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा था. तब कर्दम ऋषि ने कठोर तपस्या कर भगवान कृष्ण से लोगों के कष्ट दूर करने का वरदान मांगा था. इसके बाद यहां पवित्र जल कुंड की स्थापना हुई, जो आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. दूर-दूर से लोग यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.
भगवान कृष्ण से जुड़ी हैं कई मान्यताएं
मंदिर और कुंड के संरक्षण कार्य में गांव तथा आसपास के क्षेत्रों के भामाशाह भी बढ़-चढ़कर आर्थिक सहयोग कर रहे हैं. गांव में मौजूद प्राचीन कदंब वृक्ष भी धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हुए हैं. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि भगवान कृष्ण ने यहां सात कदम रखे थे, जिन स्थानों पर सात कदंब वृक्ष उत्पन्न हुए. इनमें से छह वृक्ष आज भी मौजूद हैं. ग्रामीण समय-समय पर इन वृक्षों और पवित्र कुंड के संरक्षण के लिए विशेष अभियान चलाते रहते हैं. मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ अब धरोहर संरक्षण गांव में एक जनआंदोलन का रूप ले चुका है. ग्रामीण कुंड की सफाई, परिसर की व्यवस्था सुधारने और धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए लगातार श्रमदान भी कर रहे हैं.
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