इजरायल की नजर, अमेरिका की सुरक्षा! पाकिस्तान से लौट रहे ईरानी वार्ताकार कैसे बचे?
वॉशिंगटन। अमेरिका और इस्राइल को भले ही एक-दूसरे का सबसे मजबूत सहयोगी माना जाता हो, लेकिन ईरान युद्ध के दौरान दोनों देशों की रणनीतियों में बड़ा टकराव देखने को मिला। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने मध्य पूर्व के अपने मित्र देशों के माध्यम से ईरान को आगाह किया था कि इस्राइल उसके दो बेहद महत्वपूर्ण नेताओं की हत्या की साजिश रच रहा है। अमेरिकी प्रशासन को डर था कि अगर युद्धविराम वार्ता में शामिल इन नेताओं पर हमला हुआ, तो शांति की पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया ध्वस्त हो जाएगी और पूरा क्षेत्र एक विनाशकारी युद्ध की आग में झुलस जाएगा।
रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालीबाफ इस युद्धविराम वार्ता को आगे बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा रहे थे। ये दोनों नेता अमेरिका, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ लगातार संपर्क में थे, ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोला जा सके और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा का कोई ठोस ढांचा तैयार किया जा सके। अमेरिका किसी भी कीमत पर इन नेताओं को खोना नहीं चाहता था, क्योंकि ऐसा होने से शांति के सारे प्रयास पटरी से उतर जाते।
अमेरिका की बड़ी चिंता और इस्राइल के निशाने
अमेरिकी खुफिया तंत्र को यह इनपुट मिला था कि इस्राइल ने गालीबाफ और अराघची को अपने संभावित निशानों की सूची में सबसे ऊपर रखा है। ट्रंप प्रशासन का स्पष्ट मानना था कि यदि इन दोनों नेताओं पर कोई आंच आती है, तो ईरान के साथ भविष्य में समझौते के सभी रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। इसी वजह से अमेरिका ने क्षेत्रीय मध्यस्थों के जरिए ईरान तक सुरक्षा संदेश पहुंचाया और साथ ही इस्राइल को भी हाथ रोकने की सलाह दी। रिपोर्ट के अनुसार, गालीबाफ 2025 के 12 दिवसीय युद्ध और हालिया संघर्ष के दौरान दो बार इस्राइली हमलों का निशाना बनने से बाल-बाल बचे थे। अप्रैल में इस्लामाबाद में हुई वार्ता के बाद ईरानी सांसद मोहसिन जंगानेह ने भी स्वीकार किया था कि गंभीर सुरक्षा खतरों के बीच यह बातचीत जारी रखी गई थी।
कड़े सुरक्षा घेरे में कूटनीतिक यात्राएं
हमलों की लगातार मिल रही धमकियों के बाद ईरान ने अपने शीर्ष नेताओं की सुरक्षा और यात्रा के तरीकों में व्यापक बदलाव किए। जब अराघची और गालीबाफ अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से मिलने पाकिस्तान पहुंचे, तो ईरान ने पाकिस्तान और कतर के जरिए अमेरिका से इस्राइल द्वारा हमला न किए जाने की लिखित गारंटी मांगी थी। इस यात्रा के दौरान ईरानी विमान को पाकिस्तानी सीमा से इस्लामाबाद तक फाइटर जेट्स की सुरक्षा दी गई। वापसी में भी एक बड़े सुरक्षा खतरे के इनपुट के बाद विमान की मशहद हवाई अड्डे पर आपात लैंडिंग कराई गई, जिसके बाद पूरा प्रतिनिधिमंडल 8 घंटे का सफर सड़क मार्ग से तय करके तेहरान पहुंचा। इस खौफ के बावजूद दोनों नेताओं ने कतर, स्विट्जरलैंड और ब्रिक्स बैठक के लिए भारत की अपनी कूटनीतिक यात्राएं जारी रखीं।
रणनीति और प्राथमिकताओं का बड़ा अंतर
शुरुआत में एक सुर में काम करने वाले अमेरिका और इस्राइल के लक्ष्य वक्त के साथ बदलते चले गए। जहां अमेरिका सैन्य दबाव के साथ-साथ एक अंतरिम समझौते और स्थायी शांति की वकालत कर रहा था, वहीं इस्राइल की प्राथमिकता ईरान के पूरे शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को खत्म कर वहां सत्ता परिवर्तन का माहौल बनाना था। इस्राइल को डर था कि जल्दबाजी में किया गया कोई भी युद्धविराम ईरान को आर्थिक रूप से दोबारा मजबूत होने और अपनी परमाणु व मिसाइल क्षमताओं को बढ़ाने का मौका दे देगा। हालांकि इस रिपोर्ट पर किसी भी देश ने आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन यह साफ तौर पर जाहिर करता है कि युद्ध के मैदान के समानांतर कूटनीति के मोर्चे पर भी एक बड़ा अंतर्विरोध चल रहा था।
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