बिजावर। बिजावर क्षेत्र के मोनासईया की पहाडिय़ों में स्थित प्राचीन शैलचित्र इतिहास, पुरातत्व और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में सामने आ रहे हैं। शोधार्थी अनेकांत जैन के अनुसार इन शैलचित्रों में प्रागैतिहासिक मानव जीवन, शिकार के दृश्य, वन्य जीवों तथा तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का जीवंत चित्रण मिलता है। यदि इनका वैज्ञानिक अध्ययन, संरक्षण और व्यवस्थित विकास किया जाए तो यह स्थल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
अनेकांत जैन ने बताया कि छतरपुर जिला पहले से ही विश्व प्रसिद्ध खजुराहो मंदिर समूह, जटाशंकर धाम, भीमकुंड और राणेह जलप्रपात जैसे पर्यटन स्थलों के कारण पहचान रखता है। ऐसे में मोनासईया के शैलचित्रों को भी पर्यटन मानचित्र पर उचित स्थान मिलने से जिले की पर्यटन श्रृंखला और अधिक समृद्ध हो सकती है। उन्होंने कहा कि यह धरोहर बुंदेलखंड के गौरवशाली अतीत की महत्वपूर्ण पहचान है।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के प्रो. सुधीर कुमार छारी ने शोधार्थी अनेकांत जैन, विद्यार्थियों एवं स्थानीय ग्रामीणों के साथ शैलचित्र स्थल का भ्रमण किया था। इस दौरान शैलचित्रों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई तथा इनके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया।
स्थानीय नागरिकों और इतिहास प्रेमियों ने शासन एवं पुरातत्व विभाग से मांग की है कि मोनासईया शैलचित्र स्थल का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए, इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया जाए तथा यहां तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़क, सूचना पट्ट, सुरक्षा व्यवस्था और अन्य आवश्यक पर्यटन सुविधाएं विकसित की जाएं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखंड का पठारी क्षेत्र भूगर्भीय और ऐतिहासिक दृष्टि से देश के सबसे प्राचीन क्षेत्रों में शामिल है, जहां पाषाणकालीन मानव सभ्यता के अनेक प्रमाण मिल चुके हैं। ऐसे में मोनासईया के शैलचित्र न केवल हजारों वर्ष पुराने इतिहास के साक्ष्य हैं, बल्कि प्राकृतिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक पर्यटन को नई दिशा देने की अपार संभावनाएं भी अपने भीतर समेटे हुए हैं।